मेरे कुछ नए दोस्तों का ये शिकवा रहता है कि, हम बहुत कम बोलते है| वो सोचते है शरमाता बहुत है कुन्दन या बात करने नहीं आती होगी!! लेकिन मै उन्हें ये बताना चाहता हूँ कि, शांत रहना हमेशा बेहतर होता है ज्यादा बोलने वालो से!! ईश्वर ने हमे दो कान तो दिए है पर जीभ एक ही दी हैं जो इस बात का संकेत करता है कि हम सुने अधिक और बोले कम| वैसे कम बोलना मेरी आदत है और यह आदत मैंने विकसित की है कभी एक समय था जब मै बहुत बोला करता था जिस पर मैंने सप्रयास नियंत्रण पा लिया है क्यूंकि, मैं जनता हूँ की कम बोलने के लाख लाभ होते है और मै हमेशा प्रयास करता हूँ की कम बोलू लेकिन सार्थक बोलू और निति में कहाँ भी गया है मौन रहना विद्वानों का आभूषण होता है; और कम बोलना मेरे व्यक्तित्व को शोभा भी देती है...:)
बुधवार, 25 जुलाई 2012
मंगलवार, 3 जुलाई 2012
बारिश तुम चली आओ
| सावन के महीने है आ गये कि तुम चली आओ अरमान है प्यासे धरती के तुम चली आओ सवारने लोगो की जिन्दगी को तुम चली आओ छाई है निराशा सब पे कि तुम चली आओ उदास है जग वाले कि तुम चली आओ छम छम मोर नाचेंगे कि तुम चली आओ कोयल गुनगुनायेगी कि तुम चली आओ पपीहा प्यास बुझाएगा कि तुम चली आओ सराबोर होंगे किसान कि तुम चली आओ लहलहाएंगे अपने खेत कि तुम चली आओ बड़ी शिद्दत से है तुम्हारा इंतज़ार कि तुम चली आओ इस जीवन का अस्तित्व के लिए तुम चली आओ बारिश, तुम चली आओ !! |
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बुधवार, 13 जून 2012
एक नयी मंजिल की ओर
चल पड़े हैं एक नयी मंजिल की ओर
उम्मीदों का संबल लिए विश्वास की शक्ति के साथ
कोशिशों के सफ़र पर खुद को माझी बनाकर
ये हम जानते है कि चुनौतिया बहुत आएगी
लेकिन मन ही मन तसल्ली देता खुद से कहता
हाँ मैं कर लूँगा इन चुनौतियों का सामना
आखिर अपनी भी तो पहचान बनानी हैं !!
( Working with CSS Infosystem on 11 June 2012.)
रविवार, 20 मई 2012
घर से आइल बा बुलावा शिवम् के जनेऊ बा
घरे से आइल बाटे बुलावा, शिवम के जनेऊ बा
पांच दिन के छुट्टी दे दीं हुजूर, घर में इंतजार बा
ना सावन में घरे गइनी ना भादो में घरे गइनी
दो साल से होली दिवाली हम जनबे ना कइनी
आपन सिरौना गँउवा देखे खातिर, कब से जियरा बेकरार बा
पांच दिन के छुट्टी दे दीं हुजूर, घर में इंतजार बा
माँ बोलावे बबुवा अइब कहिया पापा कब से देखेलन रहिया
जायेम जब घरे त बहिन हमरा के देख के बड़ा खुश होई
बड़का बाबा देख के बड़ा पुलकित होइहन
गाँव के दोस्त सब कहेला कि हमारा के भुला देले का
पैसा कमाए के खातिर गाँव बिसरा देले का
बउवा के जनेऊ के शुभ मौका पे सब लोग से मिल आयेम
नया उत्साह, नया मंजिल पावे के चाह हम ले आयेम
करतानी रउवा से इहे हम निहोरा अर्जी हमार बा मर्जी राउर बा
अगर न देहम रउवा छुट्टी त छोड़ के जायेम हम राउर नौकरी
इहे हमार विचार बा पांच दिन के छुटी दे दी हुजुर सबका हमार इंतजार बा...
( मेरे भाई शिवम् के जनेऊ (यज्ञोपवीत उपनयन संस्कार ) के शुभ अवसर पे घर से बुलावा आया है और मुझे घर जाना है ये पंक्तिया उसी के लिए है !! )
गुरुवार, 26 अप्रैल 2012
वो बचपन के दिन
| वो सावन के झूले, वो दुर्गापूजा के मेले कछुवा नदी में तैरना, और फिर पापा के हाथो पीटे जाना वो दोस्तों का साथ, वो अपनों का हाथ ना पाने की चिंता, ना खोने का गम वो नीम का दातुन, वो गाव का जामुन वो धूपो का तपना, और दिनभर क्रिकेट खेलना वो स्कूल की घंटी, वो खेल का मैदान वो नदी के किनारे आम का बागान वो होली के हुड़दंग, वो दिवाले के पटाखे वो कितने अच्छे दिन थे, वो कितने सच्चे दिन थे बहुत याद आता है अपना वो बचपन बहुत खूबसूरत था अपना वो बचपन काश !! फिर से लौट के आ जाये अपना वो बचपन !! |
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( अपना बचपन
का दिन बहुत ही खुबसूरत रहा हैं कई प्यारे और सच्चे साथी मिले जिनमे राजन, नन्दन, मुकुल, रिंकू, हेमंत, विकाश, रंजन, सत्यम, आशीष, ऋषि एक साथ खेले, पढ़े और अभी जिन्दगी के हरेक मोड़ पे साथ-साथ हैं !! )
सोमवार, 16 अप्रैल 2012
गुजरा हुआ जमाना अपने गाँव का
| याद है मुझको गुजरा हुआ जमाना अपने गाँव का वो बाग़ की बहारें वो चिडियों का चहचहाना वो कच्चे आमों के दिन गाँव में वो नर्म छाँवों के दिन गाँव में वो पल जो अपने गाँव में, गुजारा किये हैं हम वो पल जो अपने दोस्तों के साथ, संवारा किये हैं हम वो पल हमारी जिन्दगी में, बेमिसाल हैं मेरे लिए मेरा गाँव धरती पे स्वर्ग हैं ।। | ![]() |
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( मुझे हमेशा से ऐसा महसूस होता है की जिसने भी गाँव नहीं देखा उसने जीवन को करीब से नहीं देखा.. वो गाँव की सुकून भरी ज़िन्दगी, सादगी, भोलापन , बड़ो का सम्मान, अपनों से प्यार, प्रकृति से लगाव ये सब हम वहाँ पर ही तो देखते हैं )








